• Pritima Vats

Art of writing eight (आठ लिखने की कला)


-नेहा

आठ यानि ‘8’ लिखना भी एक कला है। आठ लिखते लिखते कितनी चीजें बच्चों के दिमाग में चलती रहती हैं ये मुझे अपने बच्चे को लिखाते वक़्त पता चली। सिर्फ आठ ही क्यूँ ,नंबर कोई भी हो सकता है क्यूंकि बच्चों से ज़्यादा शायद ही कोई कल्पनाशील हो। बच्चों की दुनिया कल्पना,सपनों से भरी होती है। नानी–दादी के किस्से –कहानियों की दुनिया,गप–शप की रंगीन दुनिया। बच्चे इतने गप्पी होते हैं कि आप दिन भर भी उनसे बातें करते रहें पर उनकी लच्छेदार बातें ख़त्म नही होती। मैंने अपने बेटे को नंबर्स लिखने बिठाया। बच्चे ने ब्लैकमेल किया की एक नंबर जैसे ही पूरा करूँ तो उसे स्टार चाहिए। मैंने कहा ठीक है दे दूंगी पहले लिखो तो सही। सात के बाद जब आठ लिखने की बारी आई वो भी छोटे से बॉक्स में तो बड़ी मुश्किल आ गयी। खानों में आठ को क़ैद करना थोडा आसां नही था। कहाँ इतनी बड़ी-बड़ी इमेजिनेशन बच्चे की और कहाँ छोटा सा बॉक्स फिर भी मेरे बेटे ने कोशिश की और आठ को सीधा लिखने के बजाए उसने ‘स्लीपिंग 8’ बॉक्स में लिख दिया। मैंने पूछा ऐसा क्यों लिखा तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा, ‘मेरा 8 सो गया है मम्मा’। मुझे हंसी आई और मैंने उसे 8 लिख कर दिखाया। उसने ताली बजाते हुए कहा, ‘अरे वाह ! मम्मा का 8 तो बिलकुल स्ट्रैट है “कमांडर” की तरह’। मैंने उसे भी हिदायत दी कमांडर की तरह आठ लिखने की। दूसरा 8 थोडा स्लान्टिंग हो गया मैंने पूछा ये क्या है? जवाब था साहबज़ादे का, ‘थोडा सीधा हुआ तो मम्मा अभी पूरी तरह से उसकी नींद नही खुली इसलिए थोडा सा ही सीधा है।’ तीसरे बॉक्स की बारी आई बहुत हद तक आठ सीधा लिखा गया इस बार। 8 लिखते ही अपनी हंसी को हाथों से दबाते हुए उसने कहा, ‘मेरा “कमांडर” थोडा सा झुक गया है’। मैंने कहा “कमांडर” कभी झुकते नही। थोड़ी कोशिश करो तो तुम अच्छा 8 लिख सकते हो। बहाने ख़त्म नही हो रहे थे। बेटे ने कहा, ‘मैं कैसे कोशिश करूँ मम्मा? नेक्स्ट 8 तो बोल रहा है मुझे नही आना......मुझे नही आना सबके सामने। उसे शर्म आ रही है।’ क्यों शर्म आ रही है eight को? मुझे क्या पता ! शायद उसे शुशु आई हो। इसमें शर्माने की क्या बात है जाकर वाशरूम में शुशु कर लेना चाहिए। अच्छा तो मैं शुशु करके आता हूँ। हमेशा की तरह मैंने उसे कपड़े गीले ना करने की सलाह दी। अपना चेहरा बनाते हुए बेटे ने कहा , ‘हमेशा एक ही बात बोलती हो कुछ नया भी बोला करो।’ ज्यादा बातें ना बनाओ जल्दी से आकर कंटिन्यू करो 8 लिखना।

हिलता –डुलता वापस आया और शुरू हुआ उसका लिखना। अरे! ये इतना मोटा 8 क्यों है? ‘ये 8 हमेशा नाख़ून खाता है इसलिए इसके पेट में नाख़ून का गोला बन गया है।’ बातें छोड़ के एक 8 तो अच्छे से लिख लो। हाज़िरजवाबी थी बेटे की, ‘लिखता हूँ बाबा.... लिखता हूँ।’ अब ये इतना पतला और छोटा 8 क्यों? ‘मम्मा ये कुछ नही खाता। थोडा सा खाता है फिर छोड़ देता है। इसलिए इतना दुब्बू (दुबला ) है।’ मुझे मज़ा तो आ रहा था पर एक भी आठ सही से नहीं लिखने की वजह से मेरा धेर्य लगभग ख़त्म हो रहा था फिर भी मैंने बड़े प्यार से कहा, ‘आरव एक 8 तो अच्छे से लिख कर दिखाओ प्लीज बेटू!’ इस बार का आठ ठीक-ठाक ही लिखा गया पर बॉक्स से बाहर,मैं इरेज़र लेकर मिटाने को हुई और थोड़े गुस्से से बोली,‘बॉक्स से बाहर क्यों लिखा बॉक्स के अंदर लिखो।’ उसे पता था ये गुस्सा भी प्यार वाला है इसलिए उसकी बातें जारी रहीं, ‘अरे मम्मा इस 8 को बाहर खेलने जाना है पर कोरोना की वजह से नही जा पा रहा है तो थोड़ा सा अपने बॉक्स से झाँक कर देख रहा है।’ मैंने अपने बेटे की बातों के आगे अपने को सरेंडर कर दिया। बॉक्स में लिखने मैं क्या सिखाउंगी उसे वही मुझे बातों की कला सिखा रहा था और सच मायने में ऐसी ही बातों में जीवन का रस है वरना ज़िन्दगी तो कई खानों में सबकी बँटी ही है |

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नेहा

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