• Pritima Vats

हर्ष और नन्हीं बतख

दादी ने जब से हर्ष को चिड़ियाघर वाली कहानी सुनाई है तब से उसके मन में चिड़ियाघर देखने की जिज्ञासा हो गई थी। लेकिन पापा-मम्मी के पास समय की कमी थी। हफ्ते में एक दिन इतवार का मिलता था। माँ सारा दिन घर का काम निपटाने में लगी रहती, सबके लिए कुछ अच्छा खाना बनाती और पापा लेट तक सोते रहते। फिर टीवी देखते हुए पूरा दिन गुजार देते।

एक दिन हर्ष ने अपने दादा जी से कहा कि, “ दादा जी आपका मन नहीं करता कि कभी घूमने जाऊँ”। दादा जी ने कहा, “हाँ बेटा करता तो है , लेकिन अकेले कहाँ जाऊँ। दिल्ली इतना व्यस्त शहर है, और मैं किसी को जानता भी नहीं हूँ”। हर्ष ने कहा, “क्यों न मैं,आप और दादी माँ तीनों मिलकर चिड़ियाघर देखने चलें।” दादाजी हर्ष के इस प्रस्ताव से खुश हो गए। वह बोले तुम्हारा आइडिया तो बहुत हीं अच्छा है, मैं कल ही तुम्हारे पापा से बात करता हूँ और फिर शनिवार के दिन चलते हैं घूमने के लिए।

दादा जी ने अपने बेटे से बात की और फिर दादा-दादी हर्ष को लेकर चिड़ियाघर जाने के लिए तैयार हो गए। ड्राइवर उनलोगों को चिड़ियाघर तक छोड़ आया। दादा-दादी और हर्ष तीनों ही बहुत खुश थे यहाँ आकर। तीनों चिड़ियाघरर की एक छोटी सी गाड़ी में सवार हो गए और खूब घूमे बहुत सारे जानवरों को उन्होंने देखा। सफेद चीता,हिरण,जेब्रा, हाथी, भालू सब अपनी मस्ती में इधर से उधर अपने पिंजरे में घूम रहे थे। शेर आराम कर रहा था। उल्लू अपना सर घुमा-घुमाकर सबको आश्चर्यचकित कर रहा था। हर्ष के मन में ढेरों सवाल उठ रहे थे, उसके हर सवाल का जबाव उसके दादा-दादी बड़े प्यार से दे रहे थे।घूमते-घूमते वे एक सरोवर के पास पहुँचे, जहाँ बहुत सारी बतख पानी में तैर रही थी। बतखों को तैरते हुए देखकर हर्ष खुश हुआ और दादाजी से बोला, “दादाजी क्या हम यहाँ पर थोड़ी देर रुक सकते हैं”? दादाजी ने कहा, “हाँ हाँ क्यों नहीं”। वे लोग गाड़ी से उतर गए और सरोवर के किनारे तक आ गए। वहाँ पर ढेर सारी बतख तैर रही थी, जब कोई दाना डालता वह पास आ जाती और दाना चुगकर फिर तैरते हुए दूर चली जाती। हर्ष के दादाजी ने भी उनके लिए कुछ दाना खरीदा और हर्ष को दिया। हर्ष ने बतखों को बड़े प्यार से दाना खिलाया। जब वह दाना खा रही थी, तो हर्ष उन्हें बड़े प्यार से निहारते हुए बोला, “क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगी नन्हीं बतख”।

दाना खाना छोड़कर वह एक क्षण को हर्ष की बातें सुनने लगी, फिर दाना खाने लगी। थोड़ी देर बाद हर्ष अपने दादा-दादी के साथ इधर-उधर घूमने लगा। हर्ष जिधर-जिधर जाता वह नन्हीं बतख उसके पीछे-पीछे जाने लगी। यह देखकर वहाँ मौजूद सब लोगों को भी खूब आनन्द आने लगा। सबके आकर्षण का केन्द्र बन गया हर्ष और उसकी नन्हीं बतख। वे शाम चार बजे तक खेलते रहे जबतक कि उनका ड्राइवर उन्हें लेने नहीं आ गया। चार बजे चिड़ियाघर के बन्द होने का भी समय था।

अब तो उनका करीब-करीब हर शनिवार का यही रूटीन हो गया। तीनों दोपहर को चिड़ियाघर जाते खूब घूमते, हर्ष अपनी नन्हीं बतख के साथ खूब खेलता फिर शाम चार बजे तक घर वापस आ जाते।

हर्ष को अपना यह नया दोस्त इतना पसंद आया था कि वह पूरे हफ्ते सिर्फ शनिवार का इन्तजार करता रहता। जिस शनिवार वह किसी कारणवश नहीं जा पाते हर्ष उदास हो जाता।

एक दिन उसके स्कूल में टीचर ने बताया कि वह पूरे क्लास के बच्चों को लेकर कल चिड़ियाघर जाएंगे, तो सभी बच्चे खुशी से नाच उठे। दूसरे दिन पूरे रास्ते बस में हर्ष सबको चिड़ियाघर के बारे में बताता रहा। उसकी टीचर भी प्रभावित हो रही थीं उसकी बातें सुनकर।

जब वे चिड़ियाघर पहुँचे, सबने एक लाइन बना लिया और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। तरह-तरह के जानवरों को देखते हुए जब वे सरोवर की तरफ गए तो हर्ष बतखों के झुण्ड में अपनी दोस्त को खोजने लगा। थोड़ी देर बाद नन्हीं बतख तेजी से उसकी तरफ आती हुई दिख गई। उसे देखकर हर्ष खुशी से चीख पड़ा, “वो देखो दोस्तो वो रही मेरी दोस्त, मेरी प्यारी नन्हीं बतख”। बतख भी उसे खुशी से उछलता हुआ देखकर पानी में गोल-गोल घूमकर अपनी खुशी का इजहार करने लगी। वह पानी से निकलकर बिल्कुल हर्ष के पास आ गई। हर्ष ने उसे खूब प्यार किया, दाना खिलाया। सब बच्चे उस नन्हीं सी बतख के साथ खूब खेले।

कुछ देर बाद टीचर ने सबको लाइन बनाकर निकलने के लिए बोला, तो सब बच्चे नन्हीं बतख को बाय बोलकर लाइन में लग गए। खूब सारी अच्छी यादों के साथ बच्चे वहाँ से लौटे। जब भी हर्ष अपने दादा-दादी के साथ चिड़ियाघर जाता, नन्हीं बतख के साथ खूब खेलता और दूसरे दिन जब वह स्कूल आता तो बच्चे बड़े प्यार से कुरेद-कुरेदकर उससे पूछते और हर्ष सबको उसके बारे में खूब सारी बातें बताता।

नन्हीं बतख की वजह से हर्ष सबका चहेता साथी बन गया था।

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