• Pritima Vats

‘लर्निंग डिसऑर्डर’ को जानना जरूरी है!(Learning disorders in children)


- डॉ. पीयूष चंदेल, नियोनेटोलॉजिस्ट, क्लाउड नाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स, नोएडा


सभी अभिवावकों की यही इच्छा होती है कि उनके बच्चे पढ़ाई में अच्छा करें और परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करें और कुछ अच्छा करियर हो। माता-पिता की इन आकांक्षाओं को लेकर इन दिनों बच्चों के उपर काफी दबाव देखने के मिलता है। मगर इस दवाब से फायदा कम, नुकसान ज्यादा है। अगर सही से आकलन करें तो हर बच्चे में अलग-अलग प्रतिभा होती है। कुछ बच्चे पढ़ाई के अलावा अन्य क्षेत्रों जैसे संगीत, नृत्य और कला और खेल में अच्छे होते हैं और उन्हें कभी-कभी परीक्षा में अच्छे अंक नहीं मिलते हैं।

दूसरी तरफ, कुछ बच्चे वास्तव में कठिन पढ़ाई करते हैं और फिर अच्छे अंक नहीं पाते हैं।यहां आकर चिता की एक लकीर उभरती है। हो सकता है कठिन परिश्रम करने वाला बच्चा सीखने के विकार यानी ‘लर्निंग डिसऑर्डर’

से पीड़ित हो। ‘लर्निंग डिसऑर्डर’ वाले बच्चों को डिस्लेक्सिया के रूप में जाना जाता है। उन्हें लिखने में कठिनाई होती है, जिसे ‘डिस्ग्राफिया’ के रूप में जाना जाता है और सरल गणित समस्याओं को हल करने में दिक्कतें आती हैं, जिसे ‘डिस्क्लेकुलिया’ के रूप में जाना जाता है। उन्हें सरल निर्देशों का पालन करने में भी कठिनाई होती है, वे बहुत आसानी से भूल जाते हैं। वे बाएं और दाएं, बी और डी, 6 और 9 के बीच भी भ्रमित हो सकते हैं और इसी तरह से मिलती जुलती समस्याएं आ सकती हैं। ‘लर्निंग डिसऑर्डर’ वाले बच्चों को ध्यान केंद्रित करने और सब कुछ व्यवस्थित ढंग से करने में कठिनाई होती है।

ऐसे बच्चों को कई ऐसे कामों को करने में कठिनाई होती है, जो उनकी उम्र के अन्य बच्चे बड़ी आसानी से कर लेते हैं, जैसे कि

कैंची से कागज काटना, बड़े करीने से और सही ढंग से लिखना आदि।

‘लर्निंग डिसऑर्डर’ के तहत ‘हाइपरैक्टिविटी डिसॉर्डर’ यानी जिसे आम तौर पर ‘एडीएचडी’ यह बचपन का सबसे आम न्यूरो-व्यवहार विकार है। इस विकार में बच्चे किसी विषय पर बहुत कम ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। उनका ध्यान भटकाना आसान होता है और ऐसे बच्चे हमेशा बिना किसी उद्देश्य के इधर-उधर भटकते रहते हैं। ‘एडीएचडी’ से ग्रसित बच्चों में सीखने के विकार होते हैं। लेकिन सीखने के क्रम में पाया गया है कि समस्याएं सभी क्षेत्रों नहीं होती हैं और उन्हें किसी खास क्षेत्र या विषय में दिक्कतें आ सकती हैं और हो सकता है कि दूसरे क्षेत्र या विषय में ऐसे बच्चे बहुत आगे हों। उनका प्रदर्शन शानदार हो। मुमकिन है कि ‘एडीएचडी’ से ग्रसित बच्चे

धाराप्रवाह पढ़ सकते हों, लेकिन उन्हें लिखने में कठिनाई हो। एक बच्चा पढ़ने और लिखने दोनों में अच्छा हो सकता है, लेकिन गणित के सरल सवालों को हल करने में भी कठिनाई हो सकती है। ये समस्याएं बहुत असामान्य नहीं हैं और 100 में से लगभग 10 में इस तरह के ‘लर्निंग डिसआर्डर’ हैं।

‘लर्निंग डिसआर्डर’ के कारण कई हो सकते हैं:

• जीन और गुणसूत्रों में दोष के कारण ऐसा हो सकता है। वहीं जन्म के समय के कई कारक इस समस्या को पैदा कर सकते हैं, जैसे कि जन्म के समय कम वजन, समय से पहले जन्म या फिर ऐसे बच्चे जिनको जन्म के समय सांस लेने में कठिनाई हुई थी, या फिर जन्म के संय अगर बच्चा ठीक से न रोया हो तो ऐसे लर्निंग डिसआर्डर’ हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान शराब और नशीली दवाओं का सेवन भी भी विकासशील मस्तिष्क को प्रभावित कर सकता है।

• बच्चे का सामान्य विकास घर के वातावरण और परिवार के सदस्यों के बीच के संबंधों पर निर्भर करता है। जिन परिवारों में बच्चे खुशहाल और तनाव मुक्त होते हैं, उनका विकास अच्छा होता है। जिन घरों में कलह का वातावरण होता है, वहां बच्चों के विकास में कई तरह की समस्याएं देखी गई हैं। आजकल आम तौर पर माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं और अक्सर घर पर बच्चे की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। ऐसे में अगर बच्चा अपना अधिकतर समय मोबाइल और टीवी देखने में बिताता है तो उन बच्चों को न्यूरो-व्यवहार संबंधी समस्याएं आ सकती हैं और ऐसे बच्चों को बाहरी दुनिया से ताल-मेल बिठाने में कठिनाई आती हैं। उनमें किसी चीज पर ध्यान देने की क्षमता कम हे सकती हैं और वे  नींद संबंधी विकार के शिकार हो सकते हैं

डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के पास कोई स्क्रीन समय नहीं होना चाहिए अर्थात उन्हें मोबाइल, कंप्यूटर या टीवी देखने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए। दो वर्ष से अधिक और पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन का समय अधिक नहीं होना चाहिए। जो बच्चे एक घंटे से अधिक समय तक मोबाइल या कंप्यूटर देखते हैं, उनमें ‘मायोपिया’ हो सकता है। ‘मायोपिया’ एक प्रकार की आंख की समस्या है और इसमें दूर की वस्तुओं को देखने में कठिनाई होती है।अत्यधिक स्क्रीन समय से आंखों में सूखापन, आंखों में लालिमा और दर्द होता है और नींद में कठिनाई होती है। ‘मायोपिया’ से ग्रसित बच्चे को ब्लैकबोर्ड से कॉपी करना मुश्किल हो सकता है और उनमें ‘लर्निंग डिसऑर्डर’ के समान लक्षण भी हो सकते हैं। ‘मायोपिया’ की शिकायतें

बहुत तेजी से बढ़ रही हैं और अगर समय पर ज्यादा असर पड़ता है। इसके लिए हर बच्चे कों आंखों की जांच 3 से 5 साल की उम्र के बाद होनी चाहिए और समय-समय पर जांच होती रहनी चाहिए।


क्या हो इलाज...

दुर्भाग्य से ‘लर्निंग डिसआर्डर’ का कोई इलाज नहीं है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घर पर समस्या क्षेत्रों या लक्षणों की पहचान करें और सही निदान करने के लिए डॉक्टर से परामर्श करें।

अधिकांश मामलों में हस्तक्षेप की शुरुआत बेहतर परिणाम देती है और इनमें से अधिकांश बच्चे उचित मार्गदर्शन, सहायता और मदद से चीजों को बेहतर तरीके से करना सीखते हैं। कई माता-पिता लक्षणों को अनदेखा करते रहते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि उनका बच्चा ‘लर्निंग डिसआर्डर’ वाले बच्चे के रूप में लेबल गया है। लेकिन मेरा मानना ​​है कि किसी भी समस्या को हल करने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू स्वीकृति है। अगर इन बच्चों को उचित मदद नहीं मिलती है तो वे निराश होते हैं और उनमें आत्मसम्मान की कमी होती है और कभी-कभी उनमें अवसाद घर कर लेता है, क्योंकि उनकी तुलना घर और स्कूल के अन्य बच्चों के साथ हरदम की जाती है। हर बच्चा विशेष है और प्यार, समर्थन और उचित देखभाल का हकदार है। अगर इसका इलाज नहीं किया जा सकता तो सफलतापूर्वक मैनेजमेंट तो जरूर किया जा सकता है। अगर सही समय पर पता इसका पता चल जाए तो बच्‍चे को वे काम करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए, जिनमें वह निपुण है, जैसे पेंटिंग, म्‍यूजिक, गेम्‍स वगैरह। ऐसे बच्‍चे सामान्‍य जीवन बिताते हैं ऐसे बहुत से बच्‍चे हैं जो डिस्‍लेक्सिया होने के बाद भी अच्‍छे जॉब कर रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि हर रोज बच्चों से बात करें। इससे बच्चों के साथ विश्वास और प्रेम का एक संबंध विकसित होगा। बच्चों के विकास के लिए और उनके आत्मनिश्वास के लिए यह जरूरी है। परीक्षा में कम अंक पाने के लिए अपने बच्चे को न डांटें और एक बच्चे की दूसरे के साथ तुलना तो कतई न करें। याद रखें, आपका बच्चा अनुपम है।

-अनुवाद- प्रीतिमा वत्स

©2018 by Suno Mummy........