• Pritima Vats

मेरा कान्हा


भगवान और बच्चों का अनूठा रिश्ता है। बच्चों का निश्छल और साफ मन सभी को लुभाता है। ऐसे ही निश्छलता का एक छोटा सा वाकया मैं बताना चाहती हूँ। बच्चों को पूजा-पाठ में बड़ी दिलचस्पी रहती है। नानी,दादी और माँ के साथ रहकर उन्हें कई मंत्र याद हो जाते हैं। दीप-फूल मालाएं सब उनके आकर्षण का केन्द्र होता है। इन सबके अलावा पूजा का जो खास मतलब होता है बच्चों के लिए। वो हमेशा प्रसाद की प्रतिक्षा में रहते हैं। इसलिए बच्चों के लिए पूजा का मतलब प्रसाद होता है। मीठे इलाइची दाने, किशमिश या लड्डू सब उन्हें लुभाते हैं। मेरा बेटा तो प्रसाद किसी से बाँटता ही नहीं, यहाँ तक कि भगवान के साथ भी नहीं। एक दिन मैं पूजा करना शुरू कर रही थी। अभी पूजास्थल साफ भी नहीं किया था कि बेटे की रट शुरू हो गई कि प्रसाद दे दो। मैनें उसे समझाया कि पहले पूजा करने दो फिर प्रसाद दूंगी। इसपर उसका मासूम सा जबाव था कि अगर भगवान से सारा प्रसाद खा लिया तो। मुझे हँसी आ गई। उसे समझाना बेकार था क्योंकि वह तो एक टक खाली कटोरी देख रहा था। सफाई होने के बाद मैने फूल चढ़ाए, दीप जलाए और कटोरी में प्रसाद रखा।

प्रसाद रखते ही वो जोर-जोर से चिल्लाने लगा- भगवानजी फूल खा लो, दीया खा लो पर प्रसाद मत खाना प्लीज! फूल बड़े टेस्टी होते हैं। मैंने पूछा, तुम्हें कैसे पता फूल टेस्टी होते हैं क्या तुमने खाने की कोशिश की है क्या? बेटे ने जबाव दिया...ना मम्मा तुमने बोला है ना सिर्फ खाने की चीज मुँह में लेना तो मैनें कभी फूल नहीं खाए। मैंने कहा, तो फिर तुम भगवान जी को क्यों बोल रहे हो फूल खाने को? उसका तपाक से जबाव था, वो मेरा प्रसाद न खा लें इसलिए और उनका पेट मेरी तरह थोड़े ही दर्द होगा कुछ गलत खाने से। मैंने पूछा क्यों नहीं होगा? बेटे ने जबाव दिया जब मेरे पेट में दर्द होता है तो तुम भगवान जी से ही जादू करने को कहती हो और मेरा पेट दर्द ठीक हो जाता है। मैंने कहा, मैं तुम्हें दवाई भी तो देती हूँ। उसने कहा, भगवान जी के पास भी तो दवाई होगी ना। मुझे कैसे पता होगा! बेटे ने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा, मुझे सब पता है इसलिए भगवान जी को फूल खाने दो और मुझे प्रसाद। मैंने कहा, भगवान जी बच्चों का प्रसाद नहीं खाते। उसकी हाजिरजबावी देखिए फिर उन्हें प्रसाद क्यों देती हो? जो मुझे पसंद है वही उन्हें भी क्यों पसंद है? उन्हें दाल-चावल खिलाओ या कुछ और दो खाने को। प्रसाद मेरे लिए छोड़ दो मैं प्रसाद बचा नहीं पाई। इधर मैं तुलसी में जल डालने गई और उधर मेरे कान्हा में प्रसाद पर हाथ साफ कर दिया।

- नेहा .

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