• Pritima Vats

पिताजी का प्यार

Updated: Sep 20, 2018


पढ़ाई में मन नहीं लगने की वजह से जय अक्सर अपने माता-पिता से डाँट सुनता रहता था। दस साल का जय यूँ तो पढ़ने-लिखने में काफी अच्छा था लेकिन उसका मन पढ़ाई में कम और खेलने में ज्यादा लगता था। एक दिन जय अपनी उत्तर पुस्तिका के पन्ने फाड़-फाड़ कर हवाई-जहाज बना रहा था। काफी पन्ने बर्बाद करने के बाद एक बढ़िया हवाई जहाज बन गया। वह खुशी से उछल पड़ा। अपने कमरे से निकलकर वह खुली छत पर गया और जहाज उड़ा-उड़ाकर खेलने लगा। एक बार हवा का करिश्मा था या उसके जहाज के बनावट का असर पता नहीं पर कुछ क्षणों तक जहाज हवा में स्थिर हो गया। यह देख जय बहुत अचंभित था लेकिन ठीक उसके बाद वह सीधा आँगन में जाकर गिरा। आँगन की तरफ जहाज को जाते हुए देखकर जय के तो होश उड़ गए। उसे पता था कि इस समय पिताजी आँगन में बैठे होंगे। जहाज को देखकर जरूर नाराज हो जाएँगे और खूब डाँट पड़ेगी।

थोड़ी देर तक कुछ आवाज नहीं आई तो जय ने धीरे से आँगन की तरफ झांककर देखा। आँगन का नजारा देखकर वह दंग रह गया। पिजाजी आँगन में बैठे बड़े गौर से जहाज को अपने हाथ में लेकर देख रहे थे। उनका चेहरा आश्चर्य और विस्मय से भरा हुआ था। फिर क्या था, जय मन ही मन बहुत खुश हो गया और धीरे-धीरे नीचे की तरफ जाने लगा लेकिन पिताजी से जहाज मांगने की उसकी हिम्मत नहीं हुई । वह कुछ दूरी पर जाकर चुपचाप खड़ा हो गया। उसके पिता मन ही मन यह निश्चय कर चुके थे कि अब जय को डाँटकर नहीं प्यार से हीं समझाएँगे। पिताजी ने उसे देखा और गंभीर आवाज में पूछा, "जय यह हवाई जहाज तुमने बनाया है।

जय ने सहमते हुए जबाव दिया, “जी पिताजी”।

फिर पिताजी बोले, “यह जो जहाज तुमने बनाई है ना यह बहुत सुन्दर है, लेकिन तुम्हें अपनी उत्तर पुस्तिका नहीं फाड़नी चाहिए। तुम इसकी जगह रद्दी पेपर या पुराने साल की कॉपी भी इस्तेमाल कर सकते हो।” चलो आज मैं तुम्हारे साथ जहाज बनाना सीखूँगा। सबसे पहले हम रंग-बिरंगे कागज खरीद कर लाते हैं। इतना सुनते ही जय खुशी से उछल पड़ा, वह दौड़कर अपने पिता के पास चला गया, पिताजी ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।

दोनों निकल पड़े रंगीन कागज खरीदने। जय ने अपनी पसंद का लाल रंग चुना और पिताजी ने हरा रंग। घर आकर जय की निगरानी में दोनों ने हवाई जहाज बनाए और उड़ा-उड़ाकर खेलने लगे। काफी देर तक खेलने के बाद पिताजी बोले, अब बस करो जय, मुझे और भी काम हैं। जय खुशी-खुशी मान गया और उसने अपने पिता से वादा भी किया कि अब वह कभी अपनी जरूरी उत्तर पुस्तिका के पन्ने नहीं फाड़ेगा और पिताजी उसके साथ रोज खेलेंगे तो वह अपनी पढ़ाई भी मन लगाकर पूरी करेगा। पिताजी ने भी एक वादा जय से किया कि अब से हर रोज उसके साथ थोड़ी देर पढ़ाई करेंगे, फिर खेलेंगे।

उस दिन से जय की पूरी दिनचर्या हीं बदल गई। स्कूल से आने के बाद खूब मन लगाकर पढ़ता और रोज पिताजी की बाट जोहता रहता । पिताजी भी घर आते ही जय की पढ़ाई से सम्बन्धित बातें पूछते फिर दोनों साथ-साथ खेलते। नतीजा यह हुआ कि इस साल जय अपनी कक्षा में बहुत अच्छे नम्बरों के साथ पास हुआ। रिजल्ट लेकर जय घर आया और बेसब्री से अपने पिता का इन्तजार करने लगा। पिताजी ने जय की तरक्की पर उसे खूब शाबाशी दी और गले से लगा लिया। उन्होंने मन ही मन इस बात को स्वीकार किया कि बच्चों को डाँटने की नही थोड़े से प्यार,साथ और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। हमारा थोड़ा सा सहारा उन्हें आगे बढ़ने और जिन्दगी की हर मुश्किल से लड़ने में हौसला देता है।

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-प्रीतिमा वत्स


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