• Pritima Vats

चॉकलेट का घर

चॉकलेट का घर हो मेरा

बिस्कुट का दरवाजा हो।

छत को ऊपर, छत के नीचे

खस्ता-खस्ता खाजा हो।

खिड़की हो पूरी पेड़े की

हर ताखा चमचम का हो।

चाहे आँगन बरफी का,

चाहे आलूदम का हो।

बहे दूध की नदी बगल में

शाम-सुबह पी जाएँ हम।

इस आँगन में रहें मौज से

जो इच्छा को खाएँ हम।


बचपन में एक कविता सुनाई थी पापा ने। कवि का नाम याद नहीं रहा, लेकिन कविता इतनी अच्छी थी कि मुझे अब भी याद है और कई बार बच्चों को सुना चुकी हूँ। आज मैं फिर ये कविता सुनो मम्मी के मंच से सुनो मम्मी के पाठकों तक पहुँचाना चाहती हूँ।

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