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क्रांतिकारी-चंद्रशेखर आजाद

बनारस में दिसंबर 1921 में एक स्थान पर ब्रिटिश पुलिसकर्मी सत्याग्रहियों को डंडों से पीट रहे थे। सत्याग्रही पुलिसकर्मी द्वारा पकड़-पकड़कर घसीटे जा रहे थे। अपनी आँखों के आगे यह सब होता देखकर किशोर चंद्रशेखर का खून उबल पड़ा। चंद्रशेखर ने क्रोध में पुलिस अफसर के माथे पर एक पत्थर दे मारा। पत्थर सीधा पुलिस अधिकारी के माथे पर जा लगा। वह पुलिस अधिकारी लहुलुहान हो गया। इस घटना ने पुलिसकर्मियों में खलबली मचा दी। अब पत्थर फेंकनेवाले की खोज होने लगी। चंद्रशेखर इससे पहले ही उन सबकी आँखों में धूल झोंककर निकल भागने में सफल हो गए थे। फिर भी एक पुलिसकर्मी ने उसके माथे पर लगे तिलक को देख लिया था। पुलिस का एक दल सारे नगर में घूमता रहा। अंत में वे लोग चंद्रशेखर के घर भी पहुँच गए।

कमरे में राष्ट्रीयता के वातावरण और चंद्रशेखर के माथे पर तिलक देखकर सिपाही भाँप गया कि यह लड़का वही है, इसलिए सिपाहियों ने चंद्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें थाने में लाकर हवालात में बंद कर दिया गया। जाड़ों के दिन थे, कड़कड़ाती सरदी पड़ रही थी। रात्रि के वक्त उन्हें कोई भी वस्त्र नहीं दिया गया। रात का तापमान बहुत कम होता जा रहा था। ठंड काफी बढ़ चुकी थी। थाना इंचार्ज ने सोचा क्यों न लड़के को देखा जाए, ठंड में तो जम गया होगा। थाना इंचार्ज ने सींखचों के पीछे देखा- चंद्रशेखर सिर्फ लंगोट में दंड बैठक कर रहे थे और उनके सारे बदन से पसीना चू रहा था। थानाइंचार्ज चुपचाप वहाँ से उल्टे पैर वापस अपने केबिन में आ गया। दूसरे दिन जब अदालत लगी और चंद्रशेखर आजाद को कठघरे में लाया गया तब मजिस्ट्रेट ने पूछा – “लड़के तुम्हारा नाम क्या है?” “आजाद।” लड़के ने गंभीर और निडर स्वर में जवाब दिया। “पिता का नाम?” “स्वतंत्रता।” “घर कहाँ है?” “जेलखाना”। चंद्रशेखर के द्वारा दिये गए ऐसे जवाब से मजिस्ट्रेट का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने 15 बेंतों की कड़ी सजा उन्हें सुना दी।

जेलर गंडासिंह ने जल्लाद को बुलाया और उनपर बेंत बरसाने के लिए कहा। हर बेंत चंद्रशेखर के शरीर से चमड़ी उधेड़ रही थी लेकिन उनके मुँह से सिर्फ भारत माता की जय के नारे निकलते रहे। सजा पूरी करके जबतक चंद्रशेखर आजाद बाहर आए तब-तक अदालत के चारों तरफ भीड़ उमड़ चुकी थी और भारत माता की जय के नारों से वातावरण गूँज रहा था तथा ब्रिटिश राज के प्रति विरोध प्रकट किया जा रहा था। आजाद पर फूलों की वर्षा हो रही थी और उनका पूरा शरीर फूलों से लद चुका था।

बनारस के ज्ञानवापी मुहल्ले में क्रांति की एक लहर फैल चुकी थी। बेंतों के दंड की घटना ने किशोर चंद्रशेखर को एक लोकप्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध कर दिया था। वास्तव में यह घटना चंद्रशेखर के भावी क्रांतिकारी जीवन के लिए प्रथम सोपान थी। इसी घटना के बाद वह चंद्रशेखर आजाद बने थे।

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संस्कृति सुवास से साभार

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