• Pritima Vats

उपहार में चाहिए एक दादा और एक दादी

Updated: Sep 20, 2018

'चिंटू को दादा-दादी के लाड़ ने बिगाड़ दिया', 'नाना-नानी के दुलार ने आर्यन को जिद्दी बना दिया है', ऐसे उलाहने और ऐसे आरोप न जाने जिंदगी की भाग-दौड़ में कहां खो गए? खो गईं वो लोरियां जो बच्चों को सुलाती थीं। खो गईं वो कहानियां जो बच्चों को जिंदगी का पाठ पढ़ाते थे, क्योंकि जिस जमाने में जी रहे हैं हम, उस जमाने में परिवार की परिभाषा बदल गई है, मतलब बदल गया है और कुछ हद तक मकसद भी।

महान दार्शनिक अरस्तु ने जब यह कहा होगा कि फुरसत या तो बूढ़ों को है या फिर बच्चों को, तब शायद उन्होंने इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि सदियों बात एक जमाना ऐसा भी होगा, जहां परिवार का मतलब सिर्फ पति-पत्नी और बच्चों से होगा और उस परिवार में बूढ़ों के लिए कोई जगह नहीं होगी। तभी तो इस नए जमाने में लोग भूल गये हैं कि बचपन किसे कहते हैं और हमें यह भी याद नहीं कि कभी बूढ़े और बुजुर्ग भी परिवार के अंग होते थे। इस नए जमाने की एक दुर्घटना यह भी है कि अब यहां लोरियां नहीं लिखी जाती, अब घरों में रोज रात कहानियां नहीं सुनाई जाती। रात में टीवी पर कोई सास या कोई बहू अपनी बात कहती है और बच्चे होमवर्क बनाने का बहाना करते हुए, बड़ों के बीच किसी तरह की गुंजाइश बनाकर टीवी की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं। यही नए जमाने का चलन है, जिसमें फुरसत न तो बच्चों को है और न ही घर के बड़ों को और बूढ़ों की व्यस्तता से खालीपन से किसी को कोई मतलब ही नहीं।

आज एकल परिवारों का जमाना है। पति-पत्नी और एक या ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे। संयुक्त परिवार का चलन कब का समाप्त हो गया है। शहर तो शहर, गांव में भी आज दो भाई साथ-साथ नहीं रहते। बच्चे विवाह होते ही माता-पिता से अलग रहने लगते हैं। पोते-पोती से अलग रहने वाले दादा-दादी परिवार से कट गए हैं। कहानी कहने-सुनने की परम्परा आज मनोरंजन के आधुनिक साधनों, टेलीविजन पर चैनलों की बाढ़ में लुप्त होती जा रही है। फिल्मों और टेलीविजन ने बच्चों के अबोध मन पर कब्जा कर उनकी सारी कल्पनाशीलता को लगभग खत्म कर दिया है। अपने देश की संस्कृति, परम्परा, इतिहास, सामाजिक मूल्यों से जुड़ी कहानियों के प्रति उनमें अब कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई देती है।

एक जमाना था जब बचपन गानों में गाया जाता था। बचपन किलकारियां भरता, कुलांचें मारता और उन्मुक्त हिरणों की तरह चौकड़ी भरता, इधर-उधर उछलता नजर आता था। बचपन के साथ एक स्थाई-भाव आवश्यक रूर से जुड़ा था और वह स्थाई-भाव था- उन्मुकक्तता, आजादी और हंसी। जमाना भी ऐसा था कि बचपन की उस उन्मुक्तता व हंसी की रक्षा की जाती थी। इस जमाने में बड़े-बूढ़े लोग बचपन के पहरेदार बने जाते थे। बालकों को अपने आश्रय में बड़ा करते थे ।

तब बूढ़े बच्चे हो जाते थे, लेकिन अब बच्चे बड़ी तेजी से बड़े होते जा रहे हैं। टेलीविजन ने बच्चों की पूरी दुनिया ही बदल दी है। बच्चों के खेल बदल गए हैं, उनके खिलौने बदल गए हैं, उनकी जिद बदल गई है, उनकी शरारतें बदल गई हैं। जाने-अनजाने आज के बच्चे छद्म धारावाहिकों की छद्म दुनिया और आपराधिक पृष्ठभूमि में पलते अनैतिक संबंधों की कहानियों को सुनते देखते बड़े हो रहे हैं और घर के बड़ों को इतनी फुरसत नहीं कि वे बच्चों पर ध्यान दें। "दिन-रात टीवी देखना या वीडियो खेल खेलना मानसिक रूप से निष्क्रिय करता है," चाइल्ड सैकलॉजिस्ट डॉ.दिव्या एस. प्रसाद चेतावनी भरे शब्दों में जब यह कहती हैं तो इसका सीधा और सपाट सा एक मतलब यह भी है कि बच्चों की परवरिश पर लगभग गर्व करते हुए हम एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं, जो अपनी दुनिया बसाएंगें तो वहां सुकुन शायद ही मिले, "क्योंकि एकल परिवार हाइपर एक्टिव पीढ़ी का परवरिश कर रही है, जहां जानकारियों का खजाना तो है, लेकिन जिंदगी जीने की कला नहीं।" डॉ. प्रसाद जोर देकर कहती हैं कि नौकरीपेशा माता-पिता अगर अपने बच्चों की परवरिश में बच्चों के दादा-दादी या नाना-नानी का सहयोग लें तो आने वाले कल की तस्वीर बदल सकती है।

नौकरीपेशा या टी.वी. संस्कृति का दिखावटी सुख भोगते माता-पिता बच्चों की जिज्ञासा शांत करने का प्रयास करने पर डांट देते हैं। ऐसे में यदि घर में कोई बुजुर्ग हो तो बच्चों को उनके के साहचर्य से अनौपचारिक रूर से अपनी जिज्ञासा शांत तो करने का अवसर तो मिलता ही है, साथ ही बूढ़ों को भी अपने अनुभव सुनाकर बच्चे को संस्कारित करने का सहज व सुलभ अवसर मिलने से संतोष मिलता है। बच्चों की संस्था उमंग के लिए सालों से काम कर रहीं उर्मी जैन कहती हैं, "बच्चे दादा-दादी या नाना-नानी के पास रहकर, उनके पास लेटकर, सहज रूप में पीठ पर, सिर पर प्यार दुलार से हाथ फेरते हुए किस्से-कहानियों, आप-बीती बातों और बतरस का मजा लेते जितना ज्ञान सीख सकते हैं उतना पुस्तकों, आज के शिक्षकों, टी.वी. के धारावाहिकों व व्यस्त माता-पिता से नहीं सीख सकते। "

समाजशास्त्री भी अब इस बात को मानने लगे हैं कि बदलते परिवेश में बच्चों की सही देखभाल के लिए घरों में दादा-दादी का होना जरूरी हो गया है। समाज का स्वरूप बहुत बदल गया है। संयुक्त के स्थान पर एकल परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ गई है, लेकिन अभी भी कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए घरों में बुजुर्गों के रूप में दादा-दादी या नाना-नानी की मौजूदगी जरूरी है। समाज शास्त्रियों का दावा है कि जिन घरों में बच्चे बुजुर्गों की छत्राछाया में पलते हैं उनमें आपराधिक प्रवृत्ति कम दिखती है। ऐसे में आधुनिकता की अंधी व अंतहीन दौड़ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज के प्रति हमारा कर्तव्य बच्चे को जन्म देने से कहीं अधिक एक स्वस्थ अंग के रूप में उसे समाज से जोड़ना है तो फिर कब आप अपने बच्चों को दे रहे हैं दादा-दादी का उपहार?

-प्रीतिमा वत्स


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